न कोई बंधन, न ज़ंजीरें बाकी हैं,
अहंकार की दीवारें भी गिरा दी हैं।
न अब नक़ाबों का कोई बोझ है,
ना तर्ज़-ए-जहाँ की खोज है।
ना परछाइयों से डरते हैं हम,
ना सन्नाटों में खोते हैं क़दम।
ना परवाह रही अब मंज़ूरी की,
ना ग़रज़ है किसी मज़दूरी की।
भीड़ से अलग, अपना रास्ता जुदा है,
हर मोड़ पर अपने दिल को सुना है।
अब मंज़िलों से कोई सरोकार नहीं,
सफ़र हो ख़ुशनुमा, और दरकार नहीं।

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