अग्नि परीक्षा के दौर में,
संकट के भीषण शोर में,
अनिश्चितता के घात में,
अकेलेपन से भरी रात में,
दुश्मन की तीखी ललकार में,
अपनों के कटु तिरस्कार में,
भ्रम की गहरी गुफाओं में,
ठिठुरती हुई सर्द हवाओं में,
आत्म-संशय के कोहरे में,
प्रलय के पहले झोंके में,
सागर के गहरे मंथन में,
काल के प्रचंड बंधन में,
मनुष्य के संस्कार, प्रकाश बन जाते हैं,
उसके सत्कर्म ही, नयी राह दिखते हैं।

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